अरावली पर्वतमाला की परिभाषा को लेकर सुप्रीम कोर्ट की दोबारा सुनवाई से पर्यावरण संरक्षण की उम्मीद जगी है। यह फैसला कई राज्यों को प्रभावित करेगा और खनन व विकास गतिविधियों की दिशा तय कर सकता है।
Rajasthan: अरावली पर्वतमाला की परिभाषा से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा हस्तक्षेप किया है। देशभर में पर्यावरण को लेकर उठ रही चिंताओं और विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए अदालत ने स्वतः संज्ञान लिया है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की अवकाशकालीन पीठ इस मामले की सुनवाई करेगी। इस पीठ में न्यायाधीश जे.के. माहेश्वरी और न्यायाधीश ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह भी शामिल हैं।
पर्यावरणविदों और सामाजिक संगठनों की ओर से लंबे समय से मांग की जा रही थी कि अरावली से जुड़े फैसले पर पुनर्विचार किया जाए, क्योंकि इसका असर बड़े क्षेत्र पर पड़ सकता है।
पर्यावरणविदों की चिंता क्यों बढ़ी
विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई अरावली की परिभाषा से संरक्षित क्षेत्रों में भी खनन और निर्माण गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। इससे जलवायु संतुलन, भूजल स्तर और मरुस्थलीकरण पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है।
अरावली पर्वतमाला देश की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है। पर्यावरण संगठनों का मानना है कि यदि अरावली क्षेत्र में खनन और निर्माण की छूट दी गई तो इसका दुष्प्रभाव आने वाले वर्षों में साफ दिखाई देगा।
किन राज्यों पर पड़ेगा असर

सुप्रीम कोर्ट की ओर से अरावली की परिभाषा पर दिया गया फैसला दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा और गुजरात जैसे राज्यों को सीधे प्रभावित करता है। इन राज्यों के कई इलाके अरावली पर्वतमाला के दायरे में आते हैं।
राजस्थान में पहले से ही पानी की कमी और बढ़ते मरुस्थलीकरण की समस्या गंभीर बनी हुई है। ऐसे में अरावली क्षेत्र में गतिविधियों की छूट मिलने से हालात और बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है।
20 नवंबर के फैसले से उठा विवाद
20 नवंबर को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने अरावली को लेकर अहम फैसला दिया था। इस पीठ में न्यायाधीश के. विनोद चंद्रन और न्यायाधीश एन. वी. अंजारिया भी शामिल थे।
इस फैसले में कहा गया था कि 100 मीटर से अधिक ऊंची पहाड़ियों और दो पहाड़ियों के बीच 500 मीटर तक के क्षेत्र को ही अरावली के दायरे में माना जाएगा। इससे बाहर के क्षेत्रों को खनन के लिए खोला जा सकता है। अदालत ने यह भी कहा था कि यदि खनन पूरी तरह रोका गया तो अवैध खनन बढ़ने की आशंका है।
यह फैसला केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की एक समिति की रिपोर्ट के आधार पर दिया गया था। हालांकि इसके बाद देशभर में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संगठनों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया।











