पश्चिम एशिया में युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य तनाव के कारण तेल की कीमतें बढ़ीं। भारत की IOC, BPCL और HPCL जैसी ऑयल कंपनियों पर मुनाफे का दबाव बढ़ा, जबकि सरकार खुदरा कीमतों को स्थिर रखने पर विचार कर रही है।
Oil Marketing: एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने बुधवार को चेताया है कि इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) जैसी प्रमुख ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है। इसका मुख्य कारण यह है कि महंगाई को नियंत्रित करने के लिए सरकार और कंपनियां पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों को स्थिर रखने का विकल्प चुन सकती हैं।
अमेरिका-ईरान तनाव से बढ़ी तेल की कीमतें
पश्चिम एशिया में युद्ध की स्थितियों और ईरान- अमेरिका के बीच तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिली। इस सप्ताह की शुरुआत में ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चला गया था। इस बढ़ोतरी का प्रमुख कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में तनावपूर्ण हालात हैं। यह मार्ग दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की सप्लाई के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि बुधवार को कच्चे तेल की कीमतें गिरकर करीब 88 डॉलर प्रति बैरल पर आ गईं।
S&P ने ब्रेंट क्रूड का अनुमान बढ़ाया
एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने वर्ष 2026 के लिए ब्रेंट कच्चे तेल की औसत कीमत का अनुमान 5 डॉलर बढ़ाकर 65 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है। रेटिंग एजेंसी ने कहा कि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत समुद्री रूट के माध्यम से पूरी करेगा। इसके अलावा भारत ने रूस और दक्षिण अमेरिका जैसे देशों से तेल खरीदने के विकल्प भी अपनाए हैं। फिलहाल भारत रूस से लगभग 11 लाख बैरल प्रतिदिन और वेनेजुएला से लगभग 1.42 लाख बैरल प्रतिदिन तेल खरीद रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व
भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है और यह देश दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है। रोजाना भारत लगभग 5.8 मिलियन बैरल तेल का उपयोग करता है, जिसमें से करीब 2.5 से 2.7 मिलियन बैरल तेल होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है। इसके अलावा देश की एलपीजी खपत का लगभग 55 प्रतिशत और एलएनजी खपत का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा भी इसी मार्ग से आता है।
सीमित भंडार और जोखिम
एसएंडपी ने चेताया है कि इतनी बड़ी निर्भरता के बावजूद भारत के पास सीमित भंडार हैं। रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार देश की लगभग 10 दिन की खपत के बराबर हैं, जबकि व्यावसायिक भंडार लगभग 65 दिनों की जरूरत पूरी कर सकते हैं। एलपीजी और एलएनजी का भंडार इससे भी कम है। एलपीजी का स्टॉक लगभग 25-30 दिन और एलएनजी का 10-12 दिन तक पर्याप्त माना जाता है। ऐसे में वैश्विक आपूर्ति में रुकावट या कीमतों में तेजी से भारत पर दबाव बढ़ सकता है।
मुनाफे पर दबाव
एसएंडपी के अनुसार सरकार के निर्देश और बढ़ती तेल कीमतों के कारण ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है। पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों को स्थिर रखने पर कंपनियों की मार्जिन कम हो सकती है। वहीं, तेल उत्पादन करने वाली कंपनियों जैसे ओएनजीसी को ऊंची कीमतों से फायदा हो सकता है, क्योंकि उन्हें तेल बेचने पर अधिक रेवेन्यू मिलेगा।
एलपीजी कीमतों पर नियंत्रण
भारत में एलपीजी की कीमतें सरकार द्वारा नियंत्रित की जाती हैं। बढ़ती तेल कीमतों के बावजूद महंगाई को नियंत्रित करने के लिए IOC, BPCL और HPCL जैसी कंपनियों को कीमतें स्थिर रखनी पड़ सकती हैं। ऐसी स्थिति में कंपनियों के मुनाफे पर प्रत्यक्ष दबाव पड़ेगा। सरकार जरूरत पड़ने पर बजट के जरिए सहायता या उत्पाद शुल्क में कटौती करके राहत प्रदान कर सकती है, जैसा कि रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान किया गया था।
वैश्विक तेल बाजार में भारत की भूमिका
भारत न केवल एक बड़ा उपभोक्ता है, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन में भी अहम भूमिका निभाता है। देश की रिफाइनरियां आयातित कच्चे तेल को प्रोसेस कर पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रो उत्पाद बनाती हैं और एशिया व यूरोप में निर्यात करती हैं। ऐसे में भारत की खरीद वैश्विक तेल बाजार की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है।











