कभी तालिबान का समर्थक माना जाने वाला पाकिस्तान अब अफगानिस्तान के साथ सीमा पर तनाव का सामना कर रहा है। हवाई हमले, झड़पें और TTP हमलों के कारण दोनों देशों के बीच स्थिति गंभीर बनी हुई है।
Pakistan: कभी अफगान तालिबान का सबसे बड़ा समर्थक माना जाने वाला पाकिस्तान अब उसी तालिबान के साथ ‘खुली जंग’ जैसे हालात का सामना कर रहा है। पिछले कई महीनों से दोनों पड़ोसी देशों के बीच तनाव बढ़ता रहा है और हाल ही में सीमा पर हवाई हमलों और झड़पों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
1990 के दशक में पाकिस्तान ने तालिबान के उभरने में अहम भूमिका निभाई थी। उस समय इस्लामाबाद ने तालिबान को अफगान राजनीति में स्थापित करने के लिए समर्थन और संसाधन दिए। तालिबान के सत्ता में आने के बाद भी पाकिस्तान ने इसका स्वागत किया और इसे रणनीतिक फायदा माना। लेकिन धीरे-धीरे यह दोस्ती टकराव में बदल गई। अब दोनों देशों के बीच सीमा पर लगातार तनाव की खबरें आ रही हैं।
सीमा पर हवाई हमले
पाकिस्तान ने हाल ही में अफगानिस्तान के बड़े शहरों में हवाई हमले किए। काबुल ने भी इन हमलों की पुष्टि की। अधिकारियों के अनुसार, इन हवाई और जमीनी हमलों में तालिबान के सैन्य ठिकानों, मुख्यालयों और हथियार डिपो को निशाना बनाया गया। पाकिस्तान का कहना है कि यह कार्रवाई अफगान सीमा से उनके सैनिक ठिकानों पर हमले के जवाब में की गई।

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने हालात को ‘खुली जंग’ जैसा बताया। दोनों देशों ने इस संघर्ष में भारी नुकसान होने की बात कही है। हवाई हमलों और सीमा झड़पों के बाद अफगान और पाकिस्तानी सैनिकों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया है।
तनाव की वजहें
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच यह टकराव अचानक नहीं आया। पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के रिश्तों में कई कारणों से खटास आई है। अक्टूबर 2025 में सीमा पर झड़पों के दौरान दर्जनों सैनिक मारे गए थे। इसके बाद तुर्की, कतर और सऊदी अरब की मध्यस्थता से बातचीत हुई और एक नाजुक युद्धविराम लागू हुआ, लेकिन वह ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाया।
2021 में तालिबान के दोबारा सत्ता में आने पर पाकिस्तान ने इसका स्वागत किया था। उस समय के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा था कि “अफगानों ने गुलामी की जंजीरे तोड़ दी हैं”। लेकिन समय के साथ पाकिस्तान को यह लगने लगा कि तालिबान उसकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर रहा।
इस्लामाबाद का आरोप है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के नेता और लड़ाके अफगानिस्तान में छिपे हुए हैं। इसके अलावा, बलूचिस्तान में अलगाववादी समूहों को भी अफगानिस्तान में पनाह मिलती है। 2022 के बाद से TTP और बलूच विद्रोहियों के हमले लगातार बढ़े हैं, जिससे पाकिस्तान की सुरक्षा पर सीधे खतरे का अंदेशा पैदा हुआ।
ताजा झड़प और हाल के हमले
पाकिस्तानी सुरक्षा सूत्रों का कहना है कि हाल के आत्मघाती हमलों और सैन्य ठिकानों पर हमलों के पीछे अफगानिस्तान में बैठे आतंकियों का हाथ है। 2024 के अंत से अब तक सात हमले या साजिशें अफगानिस्तान से जुड़ी थीं।

पिछले हफ्ते बाजौर जिले में हुए हमले में 11 सुरक्षाकर्मी और दो नागरिक मारे गए। पाकिस्तान का कहना है कि इस हमले को एक अफगान नागरिक ने अंजाम दिया और इसकी जिम्मेदारी TTP ने ली। वहीं, काबुल इन आरोपों से इनकार करता रहा। अफगान तालिबान का कहना है कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ नहीं होने देता।
तालिबान ने पाकिस्तान पर यह भी आरोप लगाया कि वह अपने इलाके में इस्लामिक स्टेट (IS) के लड़ाकों को पनाह दे रहा है। पाकिस्तान ने इस आरोप को पूरी तरह खारिज किया।
TTP: तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान
TTP या तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान की स्थापना 2007 में हुई थी। इसे पाकिस्तानी तालिबान भी कहा जाता है। यह संगठन अफगान तालिबान के साथ मिलकर अमेरिका नेतृत्व वाली सेना और पाकिस्तानी सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ता रहा है। पाकिस्तान ने अपने यहां TTP के खिलाफ कई बड़े सैन्य अभियान चलाए।
2016 में एक बड़े ऑपरेशन के बाद TTP के हमलों में कमी आई, लेकिन बाद में फिर से यह बढ़ने लगे। अब विश्लेषक मान रहे हैं कि पाकिस्तान अपनी सैन्य कार्रवाई और तेज कर सकता है और काबुल भी जवाबी कार्रवाई कर सकता है, जिससे सीमा पर और ज्यादा झड़पें हो सकती हैं।












