Sheetala Ashtami हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे कई जगहों पर बसोड़ा पूजा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन माता Sheetala Mata की पूजा की जाती है और विशेष रूप से बासी भोजन का सेवन करने की परंपरा होती है।
प्रयागराज: Allahabad High Court ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि केवल इस आधार पर कि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति वर्ग से है, अदालत को अनिवार्य रूप से पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का आदेश देना आवश्यक नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में न्यायालय को पहले आरोपों की प्रकृति और तथ्यों का मूल्यांकन करना चाहिए और उसके बाद ही यह तय करना चाहिए कि मामले की पुलिस जांच कराई जाए या इसे शिकायत मामले (कंप्लेंट केस) के रूप में आगे बढ़ाया जाए।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति Anil Kumar Dasham की एकलपीठ ने एक आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए की। अदालत ने आजमगढ़ निवासी कुसुम कनौजिया द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया।
क्या था मामला
अपीलकर्ता ने पवन चौबे और चार अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराने के लिए आवेदन किया था। यह मामला उत्तर प्रदेश के बरदह थाने से जुड़ा था।विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी अधिनियम) ने 19 जनवरी 2026 को दायर आवेदन को खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ अपीलकर्ता ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 के तहत पीड़ित की शिकायत को गंभीरता से लिया जाना चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अदालत हर मामले में सीधे एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे। कोर्ट के अनुसार, न्यायालय को यह अधिकार है कि वह पहले आरोपों का मूल्यांकन करे और तय करे कि मामले की जांच पुलिस द्वारा की जानी चाहिए या इसे न्यायिक प्रक्रिया के तहत शिकायत मामले के रूप में आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

न्यायिक विवेकाधिकार पर जोर
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि एससी-एसटी कानून की धारा 4 और संबंधित नियम पुलिस अधिकारियों को शिकायत मिलने पर कार्रवाई करने का निर्देश देते हैं, लेकिन इससे अदालत के न्यायिक विवेकाधिकार पर कोई असर नहीं पड़ता। कोर्ट ने कहा कि विशेष अदालत या मजिस्ट्रेट के पास यह अधिकार है कि वे मामले के तथ्यों का आकलन कर उचित प्रक्रिया तय करें। इसलिए केवल पीड़ित के एससी-एसटी वर्ग से होने के आधार पर एफआईआर दर्ज करने का आदेश देना जरूरी नहीं है।
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि एससी-एसटी कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो विशेष अदालत को आवेदन की जांच करने से रोकता हो। अदालत ने इस मामले में दो महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विचार किया। पहला, क्या विशेष अदालत को एससी-एसटी कानून के तहत दायर आवेदन पर जांच करने का अधिकार है। दूसरा, क्या निचली अदालत का फैसला कानूनी रूप से सही था या नहीं।
पूर्व फैसले का उल्लेख
सुनवाई के दौरान अदालत ने पहले दिए गए एक फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें यह कहा गया था कि मजिस्ट्रेट को अपनी अधिकार सीमा का ध्यान रखना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि कुछ मामलों में मजिस्ट्रेट द्वारा स्वयं जांच करना उचित नहीं होता, क्योंकि एससी-एसटी कानून की कुछ धाराएं इस प्रकार की प्रक्रिया को सीमित करती हैं।











