इजरायल जांच विवाद! अमेरिका ने ICC के दो जजों पर लगाए प्रतिबंध

इजरायल जांच विवाद! अमेरिका ने ICC के दो जजों पर लगाए प्रतिबंध

अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के दो जजों पर नए प्रतिबंध लगाए हैं। यह कार्रवाई गाजा युद्ध में इजरायल के संभावित युद्ध अपराधों की जांच से जुड़ी है। ICC ने इसे न्यायिक स्वतंत्रता पर हमला बताया।

America: अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (International Criminal Court – ICC) के दो और जजों पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। यह कार्रवाई गाजा में हमास के खिलाफ चल रहे युद्ध के दौरान इजरायल के संभावित युद्ध अपराधों की जांच से जुड़ी मानी जा रही है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि आईसीसी की यह पहल अमेरिका और इजरायल की संप्रभुता (sovereignty) का उल्लंघन है। इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर तनाव बढ़ गया है।

मार्को रुबियो की घोषणा से बढ़ा विवाद

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने गुरुवार को बताया कि आईसीसी के जॉर्जिया के जज गोचा लॉर्डकिपानिद्जे और मंगोलिया के जज एर्डेनेबालसुरेन डामडिन को प्रतिबंधों के लिए नामित किया गया है। इन प्रतिबंधों के तहत अमेरिका में मौजूद संभावित संपत्तियों को फ्रीज किया जा सकता है और अमेरिका की यात्रा पर भी रोक लग सकती है। रुबियो ने साफ कहा कि यह कदम इजरायल के खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई के जवाब में उठाया गया है।

इजरायल के खिलाफ जांच बना वजह

अमेरिकी प्रशासन के अनुसार ये दोनों जज उन न्यायिक अधिकारियों में शामिल हैं, जिन्होंने गाजा युद्ध के दौरान इजरायली अधिकारियों के खिलाफ संभावित युद्ध अपराधों की जांच को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई। अमेरिका का मानना है कि आईसीसी की यह प्रक्रिया राजनीतिक रूप से प्रेरित है। ट्रंप प्रशासन पहले भी आईसीसी पर इजरायल को निशाना बनाने का आरोप लगाता रहा है।

पहले भी लग चुके हैं प्रतिबंध

यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका ने आईसीसी के अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाए हों। इससे पहले भी ट्रंप प्रशासन ने आईसीसी के पूर्व मुख्य अभियोजक और कई न्यायिक एवं सहायक स्टाफ सदस्यों पर बैन लगाया था। इनमें वकील और जांचकर्ता शामिल थे। रिपब्लिकन प्रशासन का रुख शुरू से ही आईसीसी के प्रति सख्त रहा है, खासकर तब जब अदालत ने अमेरिका या उसके सहयोगी देशों से जुड़े मामलों पर कदम उठाने की कोशिश की।

रुबियो का संप्रभुता पर जोर

मार्को रुबियो ने अपने बयान में कहा कि अमेरिका आईसीसी के ऐसे किसी भी सत्ता दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं करेगा, जो अमेरिका और इजरायल की संप्रभुता का उल्लंघन करता हो। उन्होंने कहा कि आईसीसी गलत तरीके से अमेरिकी और इजरायली नागरिकों को अपने क्षेत्राधिकार (jurisdiction) में लाने की कोशिश कर रहा है। रुबियो के मुताबिक यह एक खतरनाक मिसाल है, जो भविष्य में अन्य देशों के लिए भी समस्या पैदा कर सकती है।

आईसीसी की कड़ी प्रतिक्रिया

हेग स्थित आईसीसी ने अमेरिका के इस फैसले की तीखी आलोचना की है। अदालत ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि वह इस कदम की कड़ी निंदा करती है। आईसीसी के अनुसार ये प्रतिबंध एक स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायिक संस्था पर सीधा हमला हैं। अदालत ने कहा कि जजों और अभियोजकों को कानून लागू करने के लिए धमकाना कानून के शासन (rule of law) को कमजोर करता है।

अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था पर खतरे की चेतावनी

आईसीसी ने अपने बयान में यह भी कहा कि जब न्यायिक अधिकारियों को उनके काम के लिए धमकाया जाता है, तो पूरी अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था खतरे में पड़ जाती है। अदालत ने जोर देकर कहा कि वह विभिन्न क्षेत्रों के सदस्य देशों द्वारा दिए गए जनादेश के तहत काम करती है और किसी भी दबाव के बावजूद अपने कर्तव्यों से पीछे नहीं हटेगी।

निष्पक्षता बनाए रखने का दावा

आईसीसी ने साफ किया कि वह अपने जनादेश को स्वतंत्रता और निष्पक्षता (independence and impartiality) के साथ जारी रखेगी। अदालत का कहना है कि उसका उद्देश्य किसी देश को निशाना बनाना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत गंभीर अपराधों की जांच करना है। आईसीसी ने यह भी संकेत दिया कि वह भविष्य में भी अपने काम में किसी तरह का समझौता नहीं करेगी।

नेतन्याहू के खिलाफ वारंट से जुड़ा मामला

अमेरिका की यह कार्रवाई उस पृष्ठभूमि में आई है, जब पिछले साल आईसीसी के जजों के एक पैनल ने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके पूर्व रक्षा मंत्री योआव गैलेंट के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए थे। यह वारंट गाजा युद्ध के दौरान कथित युद्ध अपराधों से जुड़े थे। इस फैसले ने अमेरिका और इजरायल दोनों को नाराज कर दिया था।

इजरायल की तीखी प्रतिक्रिया

इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने आईसीसी के वारंट को सिरे से खारिज कर दिया था। उन्होंने कहा था कि इजरायल अदालत की बेतुकी और झूठी कार्रवाइयों को घृणा के साथ खारिज करता है। वहीं योआव गैलेंट ने कहा था कि यह फैसला आत्मरक्षा के अधिकार के खिलाफ है और यह नैतिक युद्ध के सिद्धांतों को कमजोर करता है।

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