होलिका दहन 2026 2 मार्च को फाल्गुन पूर्णिमा के दिन मनाया जाएगा। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है और होलिका-प्रह्लाद की पौराणिक कथा से जुड़ा है। इस दिन होलिका की चिता जलाकर प्रह्लाद की भक्ति और भगवान विष्णु की कृपा का स्मरण किया जाता है। पर्व के अगले दिन होली का रंगोत्सव मनाया जाता है।
Holika Dahan 2026: इस साल होलिका दहन 2 मार्च, सोमवार को पूरे देश में मनाया जाएगा। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है और पुराणों में वर्णित होलिका और भक्त प्रह्लाद की कथा से जुड़ा है। फाल्गुन पूर्णिमा के दिन श्रद्धालु शाम को होलिका की चिता जलाते हैं और प्रह्लाद की भक्ति तथा भगवान विष्णु की कृपा का स्मरण करते हैं। यह पर्व परिवार और समाज में सकारात्मकता और भाईचारे को बढ़ाने के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
होलिका और प्रह्लाद की कथा
पुराणों के अनुसार, प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नामक असुर ने ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त किया था कि न उसे कोई मनुष्य, न पशु, न दिन, न रात, न अंदर, न बाहर मार सके। इस वरदान से वह अहंकार में खुद को ईश्वर मानने लगा और अपने राज्य में विष्णु भक्ति पर रोक लगा दी।
लेकिन हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था। उसने कई प्रयासों के बावजूद भी अपनी भक्ति नहीं छोड़ी। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को विषैले सांपों के पास छोड़ा, हाथियों के नीचे दबाया, ऊंचे पर्वत से गिराया और समुद्र में डुबोया। इन सभी संकटों के बावजूद भगवान विष्णु ने प्रह्लाद को सुरक्षित रखा।

होलिका दहन का प्रमुख प्रसंग
सभी प्रयास नाकाम होने पर हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को बुलाया। होलिका को अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त था। उसे प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर चिता पर बैठने के लिए कहा गया। होलिका ने ऐसा किया, लेकिन प्रह्लाद ने भय के बिना सिर्फ भगवान विष्णु का स्मरण किया।
इस दौरान होलिका का वरदान गलत तरीके से प्रयोग हुआ और वह भस्म हो गई। वहीं, भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बाहर आए। इस घटना को याद करते हुए हर वर्ष होलिका दहन का पर्व मनाया जाता है।
पर्व का धार्मिक और सामाजिक महत्व
होलिका दहन न केवल बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है, बल्कि यह हमें आंतरिक भय को छोड़ने और सच्चाई के मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देता है। फाल्गुन पूर्णिमा की इस रात को लोग होलिका की प्रतिमा जलाकर अपने जीवन से बुराई और नकारात्मक ऊर्जा दूर करने का संदेश देते हैं।
पर्व के अगले दिन होली का उत्सव मनाया जाता है, जिसमें राख और रंगों का प्रयोग करके आनंद और खुशियों का संचार किया जाता है। दक्षिण भारत और अन्य भागों में इसे विशेष भजन और कथा पाठ के साथ मनाया जाता है।
होलिका दहन की पूजा विधि
पर्व पर श्रद्धालु शाम को खुले मैदान में होलिका की प्रतिमा या लकड़ी की चिता जलाते हैं। इस दौरान मंत्रों का उच्चारण और भजन-कीर्तन भी किया जाता है। लोग इस अवसर पर सामाजिक और पारिवारिक मेलजोल बढ़ाते हैं।
कहानी के अनुसार, यह पर्व भक्ति और निष्ठा के महत्व को भी रेखांकित करता है। बच्चों और युवाओं को इस कथा के माध्यम से सिखाया जाता है कि ईश्वर में अटूट विश्वास और धर्म के मार्ग पर चलने से जीवन में बुराई पर विजय पाई जा सकती है।
बुराई पर अच्छाई की सीख
होलिका दहन हमें याद दिलाता है कि अहंकार और अन्याय कभी स्थायी नहीं रहते। प्रह्लाद की भक्ति और होलिका की चिता का दहन यह संदेश देता है कि सच्चाई, भक्ति और धर्म का मार्ग ही सुरक्षित जीवन का मार्ग है। यह पर्व परिवार और समाज में सकारात्मकता और भाईचारे को बढ़ावा देता है।
इस साल 2 मार्च को होलिका दहन के अवसर पर अपने आसपास के प्रियजनों के साथ यह पर्व मनाएं और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक अनुभव करें।









