खडूर साहिब के सांसद और एनएसए के तहत जेल में बंद अमृतपाल सिंह को झटका लगा है। पंजाब सरकार ने संसद के शीतकालीन सत्र में भाग लेने के लिए उनकी अस्थायी रिहाई के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया है।
चंडीगढ़: पंजाब के खडूर साहिब सांसद अमृतपाल सिंह के लिए राजनीतिक और कानूनी मोड़ सामने आया है। सांसद अमृतपाल, जो मार्च 2023 से एनएसए (नेशनल सिक्योरिटी एक्ट) के तहत जेल में बंद हैं, ने संसद के शीतकालीन सत्र में भाग लेने के लिए अस्थायी रिहाई की मांग की थी। लेकिन पंजाब सरकार ने इस अनुरोध को खारिज कर दिया है। संसद का यह सत्र 1 दिसंबर 2025 से शुरू होने वाला है।
पंजाब सरकार का यह निर्णय पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में पंजाब के गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव द्वारा जारी किया गया। अमृतपाल सिंह फिलहाल असम के डिब्रुगढ़ जेल में बंद हैं और जेल में उनका प्रवास करीब दो साल से जारी है।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका की अस्वीकृति
अमृतपाल सिंह ने इसी महीने सुप्रीम कोर्ट में एनएसए के तहत हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका दायर की थी। इसमें उन्होंने तर्क दिया कि एक निर्वाचित सांसद का कामकाज रोकना उनके निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। उन्होंने दावा किया कि एनएसए के तहत उनकी हिरासत राजनीतिक रूप से प्रेरित है और यह लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन कर रही है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 10 नवंबर 2025 को सुनवाई से इनकार करते हुए अमृतपाल को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय जाने का निर्देश दिया। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने हाईकोर्ट को याचिका पर छह सप्ताह के भीतर सुनवाई पूरी करने और निपटारा करने का आदेश दिया।
अमृतपाल सिंह पर आरोप
अमृतपाल सिंह पर खालिस्तान समर्थक गतिविधियों, राज्य के खिलाफ युद्ध भड़काने और रेडिकल विचारधारा फैलाने के आरोप हैं। वे ‘वारिस पंजाब दे’ संगठन के प्रमुख हैं और 2024 के लोकसभा चुनाव में खडूर साहिब से जीतकर सांसद बने थे। मार्च 2023 में पंजाब पुलिस ने अमृतपाल और उनके 9 सहयोगियों को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के बाद उन्हें एनएसए के तहत डिब्रुगढ़ जेल में शिफ्ट किया गया। जेल में बंद रहते हुए उन्होंने कई बार संसद सत्र में भाग लेने की अनुमति के लिए आवेदन किया था, जो अब पंजाब सरकार द्वारा खारिज कर दिया गया है।
अमृतपाल की रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेशों के बीच यह अस्थायी अस्वीकृति राजनीतिक और कानूनी बहस को तेज कर सकती है। उनके समर्थक इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन मान रहे हैं, जबकि राज्य सरकार इसे सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की दृष्टि से आवश्यक बता रही है।











