Supreme Court का मानवीय फैसला: बांग्लादेश से भारत आ सकेंगी गर्भवती महिला और 8 साल की बेटी

Supreme Court का मानवीय फैसला: बांग्लादेश से भारत आ सकेंगी गर्भवती महिला और 8 साल की बेटी

सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय आधार पर बांग्लादेश की एक गर्भवती महिला और उसकी आठ वर्षीय बेटी को भारत में प्रवेश की अनुमति दे दी है। जानकारी के अनुसार, महिला को कुछ महीने पहले सीमा पार कराकर बांग्लादेश भेज दिया गया था।

नई दिल्ली: भारत के Supreme Court ने एक अहम और मानवीय फैसले में बांग्लादेश की एक गर्भवती महिला और उसकी आठ वर्षीय बेटी को भारत में प्रवेश की अनुमति दे दी है। यह फैसला humanitarian grounds यानी मानवीय आधार पर लिया गया है। बताया गया है कि इस महिला को कुछ महीने पहले भारत से बांग्लादेश निर्वासित (deported) कर दिया गया था।

मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant और Justice Joymalya Bagchi की पीठ ने इस संवेदनशील मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार की सहमति को रिकॉर्ड पर लिया और आवश्यक मेडिकल व प्रशासनिक निर्देश जारी किए।

केंद्र सरकार की सहमति दर्ज

सुनवाई के दौरान Solicitor General Tushar Mehta ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार के सक्षम प्राधिकरण (competent authority) ने इस महिला और उसकी बेटी को मानवीय आधार पर भारत में प्रवेश देने पर सहमति जताई है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों को official surveillance यानी निगरानी में रखा जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि महिला सुनाली खातून और उसकी नाबालिग बेटी को फिर से Delhi लाया जाएगा। इससे पहले 27 जून को दोनों को दिल्ली से ही सीमा पार कर बांग्लादेश भेज दिया गया था।

पश्चिम बंगाल सरकार और CMO को निर्देश

कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को बच्ची की उचित देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी है। साथ ही Birbhum जिले के Chief Medical Officer (CMO) को निर्देश दिया गया है कि गर्भवती महिला सुनाली खातून को हरसंभव medical assistance उपलब्ध कराई जाए। पीठ ने यह भी कहा कि गर्भवती महिला की health condition को ध्यान में रखते हुए राज्य और केंद्र सरकार को पूरी संवेदनशीलता और जिम्मेदारी से काम करना होगा।

इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से Senior Advocate Kapil Sibal और Sanjay Hegde ने अदालत में दलील पेश की। उन्होंने कहा कि सुनाली खातून के पति और अन्य परिजन भी फिलहाल बांग्लादेश में फंसे हुए हैं और उन्हें भी भारत वापस लाना जरूरी है। दोनों वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अदालत से अनुरोध किया कि इस संबंध में Solicitor General केंद्र सरकार से आगे के निर्देश लें, ताकि पूरे परिवार को राहत मिल सके।

केंद्र सरकार का पक्ष

हालांकि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस दावे का विरोध किया कि बांग्लादेश में फंसे सभी लोग भारतीय नागरिक हैं। उन्होंने अदालत को बताया कि प्रारंभिक रिकॉर्ड के अनुसार वे लोग Bangladeshi citizens हैं। मेहता ने स्पष्ट किया कि सिर्फ महिला और उसकी बेटी को ही humanitarian consideration के तहत भारत आने की अनुमति दी जा रही है, ताकि गर्भावस्था के दौरान उसे उचित इलाज मिल सके।

इस मामले में महिला के पिता ने गंभीर आरोप लगाए हैं। उनके अनुसार, सुनाली खातून और उसका परिवार पिछले करीब 20 वर्षों से दिल्ली के रोहिणी (Rohini) सेक्टर-26 इलाके में रह रहा था। परिवार के सदस्य दिहाड़ी मजदूरी कर अपना जीवन यापन कर रहे थे। परिवार का आरोप है कि 18 जून को दिल्ली पुलिस ने उन्हें बांग्लादेशी होने के संदेह में हिरासत में लिया और फिर 27 जून को सीमापार बांग्लादेश भेज दिया गया। इसके बाद महिला की गर्भावस्था को देखते हुए यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

 

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