तिब्बत में 3.3 तीव्रता का भूकंप, 10 किलोमीटर की गहराई ने बढ़ाई आफ्टरशॉक की आशंका

तिब्बत में 3.3 तीव्रता का भूकंप, 10 किलोमीटर की गहराई ने बढ़ाई आफ्टरशॉक की आशंका

तिब्बत में 3.3 तीव्रता का भूकंप 10 किलोमीटर की उथली गहराई पर आया। इससे आफ्टरशॉक की संभावना बढ़ गई है। विशेषज्ञों ने लोगों से सतर्क रहने, कमजोर संरचनाओं से दूर रहने और राहत कार्यों के लिए तैयार रहने की सलाह दी।

Earthquake: राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (NCS) ने गुरुवार को तिब्बत में 3.3 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया। यह भूकंप 10 किलोमीटर की उथली गहराई पर आया, जिससे इसकी आफ्टरशॉक की संभावना बढ़ गई है। NCS ने चेतावनी दी है कि उथले भूकंप गहरे भूकंपों की तुलना में अधिक खतरनाक हो सकते हैं। इसका कारण यह है कि उथले भूकंप से उत्पन्न भूकंपीय तरंगें सतह तक कम दूरी में पहुँचती हैं, जिससे ज़मीन ज्यादा हिलती है और संरचनाओं को गंभीर नुकसान होने की संभावना बढ़ जाती है।

इससे पहले, 18 नवंबर को इसी क्षेत्र में 4.2 तीव्रता का भूकंप आया था, जो 10 किलोमीटर की उथली गहराई पर था। वैज्ञानिकों का मानना है कि तिब्बत और आसपास का क्षेत्र भूगर्भीय रूप से सक्रिय है और यहाँ छोटे और मध्यम तीव्रता के भूकंप आम हैं।

तिब्बती पठार और टेक्टोनिक प्लेटों की स्थिति

तिब्बती पठार भारतीय टेक्टोनिक प्लेट और यूरेशियन प्लेट के टकराव के कारण भूकंपीय रूप से सक्रिय है। यह क्षेत्र हिमालय की चोटियों का निर्माण करने वाली प्रक्रिया का हिस्सा है। पठार की ऊँचाई टेक्टोनिक प्लेटों के दबाव और उथल-पुथल के कारण बनी है। पठार में भ्रंश, स्ट्राइक-स्लिप और सामान्य फॉल्ट जैसी संरचनाएँ मौजूद हैं, जो भूकंप की गतिविधियों के प्रमुख कारण हैं।

भौगोलिक रूप से यह क्षेत्र पूर्व-पश्चिम दिशा में फैला हुआ है। उत्तर में स्ट्राइक-स्लिप फॉल्टिंग प्रमुख है, जबकि दक्षिणी तिब्बत में मुख्य टेक्टोनिक विस्तार उत्तर-दक्षिण दिशा में स्थित सामान्य फॉल्ट पर देखा जाता है। उपग्रह चित्रों और जीपीएस डेटा के अध्ययन से यह जानकारी मिली है कि दक्षिणी तिब्बत में 1970 और 1980 के दशक में उत्तर-दक्षिण दिशा में सात प्रमुख भ्रंश और दरारें पाई गई थीं। इनका निर्माण लगभग 4 से 8 मिलियन वर्ष पहले हुआ था।

भूकंप की विशेषताएँ

भूकंप की तीव्रता 3.3 होने के बावजूद इसकी उथली गहराई इसे जोखिमपूर्ण बनाती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि उथले भूकंप में भूकंपीय तरंगें सतह तक तेज़ी से पहुँचती हैं, जिससे इमारतों और बुनियादी संरचनाओं पर प्रभाव अधिक पड़ता है। ऐसे भूकंप में आफ्टरशॉक की संभावना भी बढ़ जाती है, क्योंकि भूकंप के दौरान पृथ्वी की सतह में तनाव अभी भी बना रहता है।

तिब्बत-नेपाल क्षेत्र में भूकंप का इतिहास

तिब्बत और नेपाल एक प्रमुख भूगर्भीय भ्रंश रेखा पर स्थित हैं। भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के टकराव के कारण यह क्षेत्र भूकंपीय गतिविधियों के लिए जाना जाता है। यहाँ छोटे और मध्यम तीव्रता के भूकंप समय-समय पर आते रहते हैं। पठार का टेक्टोनिक उत्थान हिमालय की चोटियों को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इस क्षेत्र में स्ट्राइक-स्लिप फॉल्टिंग और सामान्य फॉल्ट की मौजूदगी भूकंप की नियमितता का कारण बनती है। वैज्ञानिकों ने बताया है कि उत्तरी तिब्बत में स्ट्राइक-स्लिप फॉल्टिंग प्रमुख है, जबकि दक्षिणी तिब्बत में सामान्य फॉल्ट पर पूर्व-पश्चिम दिशा में विस्तार देखा गया है। 

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