2025 में भारतीय कंपनियों ने डॉलर बॉन्ड की बजाय रुपये बॉन्ड को प्राथमिकता दी। अमेरिकी ब्याज दरें और वैश्विक अनिश्चितता वजह हैं। विदेशी और घरेलू बैंक रुपये बॉन्ड मार्केट में सक्रिय होकर कंपनियों को कर्ज और बॉन्ड उपलब्ध करा रहे हैं।
Market Booms: 2025 में भारत में कंपनियों ने डॉलर में कर्ज लेने में काफी कमी की है। अमेरिकी ब्याज दरें अधिक होने और वैश्विक तनाव बढ़ने के कारण बड़ी कंपनियां अब रुपये में कर्ज लेने को प्राथमिकता दे रही हैं। रुपये में कर्ज लेना कंपनियों के लिए सस्ता और सुरक्षित विकल्प माना जा रहा है। इसके चलते भारतीय रुपये बॉन्ड (rupee bond) की बिक्री रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। विदेशी बैंक भी इस अवसर को भुनाने के लिए भारत में अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं और कंपनियों के लिए रुपये में कर्ज और बॉन्ड जारी करने की योजना पर काम कर रहे हैं।
रुपये बॉन्ड का बढ़ता चलन
स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक के डायरेक्टर प्रथमेश सहस्रबुद्धे के अनुसार, भारतीय कंपनियों के लिए रुपये में कर्ज लेना अब अधिक आकर्षक विकल्प बन गया है। दुनिया में अनिश्चितता और उच्च ब्याज दरें बनी हुई हैं, जिससे कंपनियों को विदेशी मुद्रा में कर्ज लेना महंगा और जोखिम भरा लग रहा है। बड़ी भारतीय और विदेशी (MNC) कंपनियां अब भारत में ही पैसे जुटा रही हैं क्योंकि यहां पैसा आसानी से उपलब्ध होता है और ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव कम होता है।
2025 में रुपये बॉन्ड की बिक्री अब तक ₹12.6 लाख करोड़ के स्तर तक पहुंच चुकी है। इसके मुकाबले, डॉलर बॉन्ड की बिक्री केवल $9 अरब रही है, जो पिछले साल की तुलना में 32 प्रतिशत कम है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि भारतीय कंपनियों का भरोसा अब डॉलर की बजाय रुपये पर बढ़ गया है।
विदेशी बैंकों की नई रणनीति
विदेशी बैंक जैसे स्टैंडर्ड चार्टर्ड और बार्कलेज अब भारत में रुपये बॉन्ड मार्केट में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं। बार्कलेज बैंक ने 2021 से अब तक भारत में लगभग $700 मिलियन (लगभग ₹5,800 करोड़) निवेश किया है। इसका उद्देश्य स्थानीय मार्केट में अपनी स्थिति मजबूत करना और कंपनियों को कर्ज और बॉन्ड उपलब्ध कराना है।
हाल ही में बार्कलेज ने भारती टेलीकॉम के ₹8,500 करोड़ के बॉन्ड इश्यू में मदद की। इस साल अब तक बैंक ने ₹22,600 करोड़ के सौदे किए हैं, जो पिछले साल की तुलना में लगभग 37 प्रतिशत अधिक है। इस वृद्धि से यह स्पष्ट होता है कि विदेशी बैंक भारत के रुपये बॉन्ड मार्केट में तेजी से सक्रिय हो रहे हैं।
घरेलू बैंकों से कड़ी टक्कर
विदेशी बैंकों को भारतीय बाजार में कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। एक्सिस बैंक, एचडीएफसी बैंक और अन्य निजी भारतीय बैंक रुपये बॉन्ड मार्केट में सबसे आगे हैं। इनके पास अधिक जमा राशि, व्यापक शाखा नेटवर्क और सरकार का समर्थन मौजूद है, जिससे वे विदेशी बैंकों के लिए चुनौती बन रहे हैं।
कैपरी ग्लोबल के डायरेक्टर अजय मंगलूनिया के अनुसार, अब विदेशी बैंकों को यह समझ आ गया है कि भारत में रुपये में कर्ज देना ही उनके लिए फायदे का सौदा है। लेकिन इसे सफल बनाने के लिए उन्हें स्थानीय बैंकों के साथ सीधा मुकाबला करना पड़ेगा। भारतीय बैंक अपने अनुभव और नेटवर्क के कारण यह मुकाबला आसानी से जीत सकते हैं।
रुपये बॉन्ड के फायदे
रुपये में कर्ज लेने की प्रमुख वजह है लागत और सुरक्षा। कंपनियों के लिए स्थानीय मुद्रा में कर्ज लेना आसान है क्योंकि उन्हें विदेशी मुद्रा में उतार-चढ़ाव का जोखिम नहीं उठाना पड़ता। इसके अलावा, भारत में ब्याज दरें स्थिर हैं, जिससे कंपनियों को वित्तीय योजना बनाने में सुविधा मिलती है। डॉलर बॉन्ड की तुलना में रुपये बॉन्ड में निवेशकों और कंपनियों दोनों को भरोसा अधिक है।
विदेशी बैंक भी इस अवसर को भुनाने के लिए अपने ग्राहक नेटवर्क और वित्तीय विशेषज्ञता का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे भारतीय कंपनियों के लिए बॉन्ड जारी कर रही हैं और उन्हें रुपये में कर्ज उपलब्ध करा रही हैं। इससे कंपनियों के पास पूंजी जुटाने के विकल्प बढ़ रहे हैं और विदेशी बैंक भी स्थानीय मार्केट में अपनी स्थिति मजबूत कर पा रहे हैं।
2025 में बॉन्ड मार्केट का रुझान
2025 में भारतीय रुपये बॉन्ड की बिक्री रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई है। बड़ी कंपनियां अब डॉलर की बजाय रुपये में कर्ज लेने को प्राथमिकता दे रही हैं। विदेशी बैंकों की भागीदारी बढ़ रही है और घरेलू बैंकों के साथ प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है। निवेशकों के लिए यह संकेत है कि भारतीय बॉन्ड मार्केट स्थिर और आकर्षक हो गया है।










