कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर सियासी घमासान थमने का नाम नहीं ले रहा है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुबानी जंग जारी है।
बेंगलुरु: कर्नाटक की राजनीति एक बार फिर नेतृत्व परिवर्तन और ‘ढाई साल के फॉर्मूले’ को लेकर गहरे संकट में फंसती नजर आ रही है। कांग्रेस के भीतर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच जारी खींचतान अब खुलकर सामने आने लगी है। दोनों नेताओं के हालिया सोशल मीडिया पोस्ट को राजनीतिक हलकों में एक-दूसरे पर परोक्ष वार के रूप में देखा जा रहा है।
कर्नाटक में कांग्रेस सरकार बने ढाई साल पूरे होने के बाद अब राजनीतिक गलियारों में यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि क्या तय फॉर्मूले के मुताबिक अब मुख्यमंत्री बदले जाएंगे या सिद्धारमैया अपना कार्यकाल पूरा करेंगे। हालांकि, कांग्रेस पार्टी की ओर से अब तक नेतृत्व परिवर्तन को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन अंदरूनी बयानबाजी ने संकट को और बढ़ा दिया है।
‘ढाई साल फॉर्मूला’ कैसे बना विवाद की जड़?
माना जाता है कि 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद सरकार गठन के दौरान सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच सत्ता साझा करने का एक अनौपचारिक समझौता हुआ था, जिसके तहत सिद्धारमैया ढाई साल मुख्यमंत्री रहेंगे और उसके बाद शिवकुमार को यह जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। हालांकि, पार्टी ने इस फॉर्मूले को कभी सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया।
20 नवंबर को सिद्धारमैया सरकार के ढाई साल पूरे हो चुके हैं, जिसके बाद एक बार फिर नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं तेज हो गई हैं। यही वह समय है, जब डीके शिवकुमार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट कर “शब्द” और “वादे” की ताकत पर जोर दिया, जिसे सीधे तौर पर हाईकमान को याद दिलाने के रूप में देखा गया।

डीके शिवकुमार का इशारा और सियासी संदेश
शिवकुमार ने अपनी पोस्ट में लिखा कि, दुनिया की सबसे बड़ी ताकत अपनी बात पर कायम रहना है। चाहे वह जज हों, राष्ट्रपति हों या कोई और—मैं भी इसमें शामिल हूं—सभी को अपने शब्द पर चलना चाहिए। शब्द की ताकत ही विश्व की ताकत है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान सीधे तौर पर उस कथित समझौते की ओर इशारा करता है, जो सरकार गठन के समय हुआ था। शिवकुमार को लंबे समय से कर्नाटक में सिद्धारमैया के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाता रहा है।
डीके शिवकुमार की पोस्ट के कुछ ही घंटों बाद मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी लगभग उसी शब्दावली में जवाब दिया। उन्होंने स्पष्ट संकेत दिया कि वे मुख्यमंत्री पद छोड़ने के मूड में नहीं हैं और जनता ने उन्हें पूरे पांच साल के लिए जनादेश दिया है। सिद्धारमैया ने लिखा, कर्नाटक की जनता का जनादेश कोई क्षणिक घटना नहीं, बल्कि पांच साल की जिम्मेदारी है। शब्द तब तक ताकत नहीं है, जब तक वह लोगों के लिए दुनिया को बेहतर न बनाए।
उन्होंने अपने पूर्व कार्यकाल (2013–2018) का हवाला देते हुए कहा कि उस समय उन्होंने 165 में से 157 वादे पूरे किए थे, जो 95 प्रतिशत से अधिक है। मौजूदा कार्यकाल का जिक्र करते हुए उन्होंने दावा किया कि अब तक 593 में से 243 से ज्यादा वादे पूरे किए जा चुके हैं, जबकि बाकी वादों को भी पूरी प्रतिबद्धता के साथ पूरा किया जाएगा।











