हम अक्सर 'आज' के आनंद में इतने खो जाते हैं कि 'कल' की चुनौतियों को भूल जाते हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में मौज-मस्ती के साथ-साथ कठिन परिश्रम और भविष्य की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। जो समय रहते अपनी तैयारी नहीं करता, उसे अंत में पछताना ही पड़ता है।
मुख्य कहानी
एक बार की बात है, गर्मियों के सुहावने दिन चल रहे थे। सूरज चमक रहा था और जंगल में चारों तरफ हरियाली थी। मौसम इतना प्यारा था कि हर कोई बस आराम करना चाहता था।
उसी जंगल में एक टिड्डा रहता था। वह स्वभाव से बहुत ही आलसी और लापरवाह था। उसका दिन बस इधर-उधर कूदने, गाने और नाचने में बीतता था। उसके लिए जीवन का मतलब सिर्फ 'मौज-मस्ती' था।
एक दिन, टिड्डा एक पेड़ की छांव में बैठकर अपनी वायलिन बजा रहा था और जोर-जोर से गा रहा था। तभी उसकी नजर वहां से गुजर रही एक छोटी सी चींटी पर पड़ी। चींटी बहुत मेहनत कर रही थी। वह अपने वजन से भी भारी अनाज का दाना अपनी पीठ पर लादकर ले जा रही थी। वह पसीने से लथपथ थी, लेकिन उसकी चाल में गजब की तेजी और अनुशासन था।
टिड्डे ने उसे देखा और हंसते हुए बोला, 'अरे चींटी बहन! इतनी प्यारी धूप खिली है, मौसम इतना सुहाना है और तुम हो कि बेवजह पसीना बहा रही हो। यह भारी बोझ छोड़ो और मेरे पास आओ। हम मिलकर गाएंगे और बातें करेंगे।'
चींटी ने रुके बिना जवाब दिया, 'नहीं टिड्डे भाई, मैं रुक नहीं सकती। सर्दियां आने वाली हैं और मैं उन दिनों के लिए भोजन जमा कर रही हूँ। अगर मैंने अभी मेहनत नहीं की, तो सर्दियों में हम भूखे मर जाएंगे। मैं तुम्हें भी यही सलाह दूंगी कि गाना छोड़ो और कुछ भोजन जमा कर लो।'
टिड्डा जोर से हंसा और बोला, 'अरे, सर्दियां आने में तो अभी बहुत वक्त है! अभी तो गर्मियां शुरू ही हुई हैं। हमारे पास बहुत समय है। देखो, चारों तरफ कितना खाना पड़ा है। बेवजह की चिंता क्यों करती हो? आओ, जीवन का आनंद लो।'
चींटी ने उसकी मूर्खतापूर्ण बातों पर ध्यान नहीं दिया और अपना काम करती रही। पूरी गर्मियों में यही सिलसिला चलता रहा। टिड्डा दिन भर गाता और सोता, जबकि चींटी और उसका परिवार दिन-रात मेहनत करके अनाज का एक-एक दाना अपने बिल में जमा करते रहे।
धीरे-धीरे दिन बीतते गए। गर्मियां खत्म हुईं, पतझड़ आया और फिर देखते ही देखते कड़ाके की ठंड आ गई। सूरज बादलों में छिप गया और जंगल में बर्फ गिरने लगी। पूरा जंगल सफेद चादर से ढक गया।
अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी थी। जो हरे-भरे पौधे और घास गर्मियों में हर जगह दिखते थे, वे अब बर्फ के नीचे दब गए थे। खाने के लिए एक तिनका भी नहीं बचा था।
टिड्डा, जो अब तक सिर्फ गा रहा था, अब ठंड से ठिठुर रहा था। उसका पेट भूख से तड़प रहा था। उसने यहाँ-वहाँ बहुत ढूंढा, लेकिन उसे खाने को कुछ नहीं मिला। वह कमजोर हो गया और उसे लगा कि अब वह नहीं बचेगा।
तभी उसे चींटी की याद आई। उसने सोचा, 'चींटी ने गर्मियों में बहुत सारा खाना जमा किया था। शायद वह मेरी मदद कर दे और मुझे थोड़ा सा खाना दे दे।'
कांपता हुआ टिड्डा चींटी के घर पहुँचा और दरवाजा खटखटाया। चींटी ने दरवाजा खोला। अंदर का नजारा देखकर टिड्डा हैरान रह गया। चींटी का घर गर्म था और वहां अनाज का भंडार भरा हुआ था। चींटियां मजे से अपना खाना खा रही थीं।
टिड्डे ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, 'चींटी बहन, मुझे बहुत भूख लगी है। मैंने कई दिनों से कुछ नहीं खाया है। कृपया मुझे थोड़ा सा अनाज दे दो, वरना मैं मर जाऊंगा।'
चींटी ने उसे देखा और पूछा, 'अरे टिड्डे भाई! तुम तो वही हो न, जो गर्मियों में मेरा मजाक उड़ाते थे? जब मैं मेहनत कर रही थी, तब तुम क्या कर रहे थे? तुमने अपने लिए खाना जमा क्यों नहीं किया?'
टिड्डे ने शर्मिंदा होकर सिर झुका लिया और बोला, 'मैं... मैं गर्मियों में बहुत व्यस्त था।'
'व्यस्त?' चींटी ने हैरानी से पूछा, 'तुम किस काम में व्यस्त थे?'
टिड्डा बोला, 'मुझे गाना गाना और नाचना बहुत पसंद था। मैं पूरा समय बस गाने और नाचने में ही व्यस्त रहा, इसलिए मुझे काम करने का वक्त ही नहीं मिला।'
चींटी ने गुस्से और अफसोस के साथ कहा, 'अच्छा! तो तुमने पूरी गर्मियां गाकर बिता दीं? तो अब एक काम करो, सर्दियां नाचकर बिता लो।'
चींटी ने यह समझाते हुए दरवाजा बंद कर लिया कि जो वक्त की कद्र नहीं करता, वक्त भी उसकी मदद नहीं करता। टिड्डा बाहर ठंड में अपनी गलती पर पछताता रह गया।
सीख
भविष्य की तैयारी: हमे हमेशा आने वाले कल के लिए तैयार रहना चाहिए। जीवन में काम और मनोरंजन दोनों का अपना स्थान है। जो व्यक्ति सही समय पर काम नहीं करता और आलस्य में अपना समय बर्बाद करता है, उसे मुश्किल समय में दूसरों के सामने हाथ फैलाना पड़ता है या कष्ट सहना पड़ता है। 'आज की मेहनत ही कल का सुख है।'













