हेल्थ इंश्योरेंस पर जीएसटी हटने के बाद भी उपभोक्ताओं को राहत नहीं मिली। बीमा कंपनियों ने बेस प्रीमियम बढ़ाकर फायदा कम कर दिया। विशेषज्ञों ने नियामक से हस्तक्षेप की मांग की है।
Rajasthan: केंद्र सरकार ने 22 सितंबर को जीएसटी रिफॉर्म के तहत पर्सनल लाइफ और हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम पर जीएसटी को शून्य कर दिया था। इस फैसले का मकसद आम लोगों को राहत देना था, ताकि स्वास्थ्य बीमा सस्ता हो और ज्यादा लोग बीमा कवर ले सकें। सरकार के इस कदम के बाद उपभोक्ताओं को उम्मीद थी कि उन्हें सीधे तौर पर 18 प्रतिशत तक का फायदा मिलेगा और सालाना प्रीमियम में अच्छी-खासी कमी आएगी। खासकर मध्यम वर्ग और नौकरीपेशा लोगों को इससे बड़ा सहारा मिलने की बात कही जा रही थी।
बीमा कंपनियों ने क्यों बढ़ाया बेस प्रीमियम
जीएसटी हटने के बाद बीमा कंपनियों ने अपने बेस प्रीमियम में 8 से 12 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी कर दी। इसका सीधा असर उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ा।
विशेषज्ञों का कहना है कि पहले कंपनियां जीएसटी के जरिए इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) का फायदा लेती थीं। जब जीएसटी शून्य हुआ, तो यह सुविधा भी खत्म हो गई। कंपनियों का तर्क है कि इससे उनकी लागत बढ़ गई है। इसी नुकसान की भरपाई के लिए उन्होंने बेस प्रीमियम बढ़ा दिया।
इस फैसले के कारण कई मामलों में उपभोक्ताओं को जीएसटी हटने का पूरा लाभ नहीं मिल पाया, जबकि कुछ को पहले से भी ज्यादा प्रीमियम देना पड़ रहा है।
फायदा कम, बोझ ज्यादा
जयपुर निवासी केंद्र सरकार के एक कर्मचारी पिछले 10 साल से अपने परिवार के लिए निजी स्वास्थ्य बीमा करा रहे हैं। पिछले साल उनका बेस प्रीमियम 10,000 रुपए था, जिस पर 18 प्रतिशत जीएसटी यानी 1,800 रुपए अतिरिक्त देने पड़ते थे। कुल मिलाकर उन्हें 11,800 रुपए चुकाने पड़ते थे। इस साल जीएसटी तो हटा दिया गया, लेकिन कंपनी ने बेस प्रीमियम बढ़ाकर 11,000 रुपए कर दिया। नतीजा यह हुआ कि जहां उन्हें 1,800 रुपए की राहत मिलनी चाहिए थी, वहां सिर्फ 800 रुपए का ही फायदा मिला।
इसी तरह एक अन्य सरकारी कर्मचारी, जो पिछले पांच साल से निजी हेल्थ इंश्योरेंस ले रहे हैं, उनका सालाना प्रीमियम पिछले साल 34,120 रुपए था। जीएसटी हटने के बाद उन्हें उम्मीद थी कि प्रीमियम घटकर करीब 28,000 रुपए रह जाएगा। लेकिन इस साल उनका प्रीमियम बढ़कर 35,819 रुपए कर दिया गया। पूछताछ करने पर कंपनी ने केवल इतना कहा कि प्रीमियम दरें बढ़ गई हैं।
नियामक की भूमिका पर उठे सवाल
उपभोक्ता संगठनों और बीमा विशेषज्ञों का मानना है कि जीएसटी हटाने का फायदा आम लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है। कंपनियां आईटीसी का हवाला देकर प्रीमियम बढ़ा रही हैं, लेकिन इसका बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर डाल दिया गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बीमा नियामक प्राधिकरण को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए। प्रीमियम बढ़ोतरी की स्पष्ट वजह बताई जानी चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सरकारी फैसलों का लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचे। अगर इसी तरह प्रीमियम बढ़ता रहा, तो हेल्थ इंश्योरेंस आम आदमी की पहुंच से दूर होता चला जाएगा, जबकि सरकार का उद्देश्य इसके बिल्कुल उलट था।











