पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। कभी वामपंथ का गढ़ रहे राज्य में अब मुख्य मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच सिमट गया है। 2026 विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं।
West Bengal: पश्चिम बंगाल की राजनीति पिछले एक दशक में तेजी से बदली है। कभी वामपंथ यानी Left Front का मजबूत गढ़ रहे इस राज्य में अब मुकाबला लगभग पूरी तरह दो पार्टियों के बीच सिमट गया है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच सीधी राजनीतिक लड़ाई दिखाई दे रही है।
इस वर्ष अप्रैल-मई में राज्य में विधानसभा चुनाव होने की संभावना है। पश्चिम बंगाल की विधानसभा में कुल 294 सीटें हैं और इन सभी सीटों पर चुनाव होना है। 15वीं विधानसभा का कार्यकाल 7 मई को समाप्त हो रहा है। ऐसे में सभी राजनीतिक दल अभी से चुनावी रणनीति बनाने में जुट गए हैं।
अगर पिछले तीन चुनावों यानी 2016, 2021 और 2026 की तैयारियों को देखा जाए तो साफ दिखाई देता है कि राज्य का Political Map काफी बदल चुका है। वामपंथी दल लगभग पूरी तरह हाशिए पर चले गए हैं और अब मुख्य मुकाबला TMC और BJP के बीच बन गया है।
2016 में TMC का दबदबा
2016 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली TMC ने भारी जीत दर्ज की थी। उस चुनाव में TMC को 211 सीटें मिली थीं और पार्टी ने स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाई थी।
उस समय वाम मोर्चा और कांग्रेस ने गठबंधन किया था। हालांकि इस गठबंधन को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। पूरे चुनाव में उन्हें केवल 32 सीटें मिलीं। इनमें CPI(M) को 26 सीटें मिली थीं जबकि कांग्रेस को बहुत सीमित सफलता मिली थी।
वहीं BJP उस समय राज्य की राजनीति में बहुत छोटी ताकत थी। पार्टी को केवल 3 सीटों पर जीत मिली थी। ये सीटें मुख्य रूप से दार्जिलिंग और कुछ शहरी क्षेत्रों से जुड़ी थीं।
उस चुनाव में TMC ने दक्षिण बंगाल में लगभग पूरी तरह अपना कब्जा बना लिया था। दक्षिण 24 परगना जिले की सभी 31 सीटों पर पार्टी ने जीत दर्ज की थी। कोलकाता के अधिकांश शहरी क्षेत्रों में भी TMC को मजबूत समर्थन मिला था।
हालांकि मुर्शिदाबाद और कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में वामपंथी दलों का प्रभाव उस समय भी दिखाई देता था। 2011 के परिसीमन के बाद 23 जिलों में 294 विधानसभा क्षेत्र तय किए गए थे, जिससे TMC के ग्रामीण वोट बैंक को मजबूती मिली थी।
2021 में BJP की बड़ी एंट्री
2021 का विधानसभा चुनाव पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव लेकर आया। इस चुनाव में BJP ने जोरदार प्रदर्शन किया और पहली बार राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी बनकर उभरी। BJP ने 77 सीटों पर जीत दर्ज की और अपने वोट शेयर में भी बड़ी बढ़ोतरी की। पार्टी को खासकर जंगलमहल क्षेत्र और उत्तर बंगाल में अच्छा समर्थन मिला।
जंगलमहल के जिलों जैसे पश्चिम मेदिनीपुर, झाड़ग्राम, पुरुलिया और बांकुरा में BJP ने कई सीटें जीतीं। इसी तरह दार्जिलिंग और जलपाईगुड़ी जैसे उत्तर बंगाल के इलाकों में भी पार्टी ने मजबूत प्रदर्शन किया। हालांकि इस चुनौती के बावजूद TMC ने सत्ता बरकरार रखी। ममता बनर्जी की पार्टी ने 213 सीटों के साथ फिर से स्पष्ट बहुमत हासिल किया।
TMC को खासकर अल्पसंख्यक बहुल जिलों में बड़ी सफलता मिली। मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर तथा दक्षिण 24 परगना जैसे क्षेत्रों में पार्टी का दबदबा बना रहा। दक्षिण 24 परगना की 31 सीटों में से अधिकतर पर TMC को जीत मिली। इसी तरह हावड़ा और हुगली जैसे जिलों में भी पार्टी ने मजबूत प्रदर्शन किया।
वोट बैंक और क्षेत्रीय समीकरण

2021 के चुनाव में वोट बैंक की राजनीति भी साफ दिखाई दी। BJP ने नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी NRC जैसे मुद्दों के जरिए सीमावर्ती और आदिवासी क्षेत्रों में समर्थन हासिल करने की कोशिश की। वहीं TMC ने अल्पसंख्यक और गरीब वर्ग के बीच अपनी कल्याणकारी योजनाओं के जरिए मजबूत पकड़ बनाए रखी।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राज्य में लगभग 30 से 40 प्रतिशत अल्पसंख्यक वोट बैंक है और इस वर्ग का बड़ा हिस्सा TMC के साथ बना रहा। यही वजह थी कि BJP को कई मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में सफलता नहीं मिल सकी।
2026 चुनाव से पहले नया समीकरण
अब 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले एक और बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची का विशेष गहन संशोधन यानी Special Intensive Revision (SIR) किया गया है। इस प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से करीब 63.66 लाख नाम हटाए गए हैं। यह कुल मतदाताओं का 10 प्रतिशत से भी अधिक माना जा रहा है।
इस बदलाव का असर राज्य की 125 से अधिक विधानसभा सीटों पर पड़ सकता है। खासकर सीमावर्ती क्षेत्रों, मतुआ समुदाय वाले इलाकों और अल्पसंख्यक जिलों में इसका असर देखने को मिल सकता है। मतुआ यानी नमशूद्र समुदाय वाले क्षेत्रों में BJP को इससे फायदा हो सकता है। वहीं मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे अल्पसंख्यक बहुल जिलों में TMC को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
कुछ जिलों में बढ़ा चुनावी तनाव
उत्तर और दक्षिण 24 परगना जिले की कुल 64 सीटें इस चुनाव में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। इसके अलावा पुरबा बर्धमान और पुरबा मेदिनीपुर जैसे जिलों में भी राजनीतिक मुकाबला काफी कड़ा होने की संभावना है।
राज्य की आर्थिक स्थिति भी चुनावी चर्चा का बड़ा मुद्दा बनती जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार राज्य का वित्तीय घाटा लगातार बढ़ रहा है। 2022-23 में जहां घाटा लगभग 49 हजार करोड़ रुपये था, वहीं आने वाले वर्षों में यह बढ़कर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक होने का अनुमान है। विपक्षी दल इसी मुद्दे को लेकर सरकार पर लगातार हमला कर रहे हैं।
उत्तर और दक्षिण बंगाल का राजनीतिक विभाजन
पश्चिम बंगाल की राजनीति में उत्तर और दक्षिण बंगाल के बीच राजनीतिक विभाजन भी धीरे-धीरे स्पष्ट होता जा रहा है। दक्षिण बंगाल में TMC की पकड़ अभी भी मजबूत मानी जाती है। वहीं उत्तर बंगाल के कई इलाकों में BJP को अच्छा समर्थन मिल रहा है।
इसी वजह से 2026 के चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या TMC फिर से 200 से अधिक सीटों का आंकड़ा पार कर पाती है या BJP अपने लक्ष्य के अनुसार 100 से अधिक सीटों तक पहुंचने में सफल होती है।
वामपंथ का लगभग अंत
पश्चिम बंगाल की राजनीति में सबसे बड़ा बदलाव वामपंथी दलों के पतन के रूप में देखा जा रहा है। कभी तीन दशक तक सत्ता में रहने वाला Left Front अब चुनावी राजनीति में लगभग गायब होता दिखाई दे रहा है। 2016 में जहां वाम-कांग्रेस गठबंधन को सीमित सीटें मिली थीं, वहीं 2021 में उनका प्रदर्शन और कमजोर हो गया। अब राजनीतिक मुकाबला लगभग पूरी तरह TMC और BJP के बीच सिमट गया है।












