डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका ने WHO से औपचारिक रूप से नाता तोड़ लिया। एक साल में 70 अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से बाहर निकलने के फैसले ने वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा और बहुपक्षीय सहयोग की भविष्य की दिशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
America Left WHO: अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO से औपचारिक रूप से नाता तोड़ लिया है। 22 जनवरी 2026 को यह प्रक्रिया पूरी हो गई, जिससे अमेरिका अब WHO का सदस्य नहीं रहा। यह फैसला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही ले लिया गया था। ट्रंप प्रशासन ने इसे अमेरिकी हितों की रक्षा का कदम बताया है, लेकिन दुनिया भर में इस फैसले को वैश्विक सहयोग और स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
WHO से अलग होना सिर्फ एक संगठन से दूरी नहीं है, बल्कि यह अमेरिका की उस नई नीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और बहुपक्षीय समझौतों से तेजी से बाहर निकल रहा है।
कैसे और क्यों शुरू हुई WHO से अलग होने की प्रक्रिया
20 जनवरी 2025 को, अपने दूसरे कार्यकाल के पहले ही दिन, राष्ट्रपति ट्रंप ने एक Executive Order जारी किया। इस आदेश में साफ कहा गया कि अमेरिका WHO से बाहर निकलेगा। सरकार का आरोप था कि WHO ने कोविड-19 महामारी के दौरान गंभीर गलतियां कीं।
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि WHO समय पर फैसले नहीं ले सका, संगठन पर कुछ देशों का राजनीतिक दबाव रहा और जरूरी सुधारों को नजरअंदाज किया गया। इसी आधार पर अमेरिका ने WHO से पूरी तरह अलग होने का फैसला किया।
WHO की फंडिंग बंद
इस फैसले के तहत अमेरिका ने WHO को दी जाने वाली सारी फंडिंग तुरंत बंद कर दी। अमेरिकी सरकार ने अपने सभी कर्मचारियों और ठेकेदारों को जिनेवा स्थित WHO मुख्यालय और दुनिया भर के WHO दफ्तरों से वापस बुला लिया।
इतना ही नहीं, जिनेवा में WHO मुख्यालय के बाहर लगा अमेरिकी झंडा भी हटा दिया गया। यह कदम साफ संकेत था कि अमेरिका अब इस वैश्विक संस्था का हिस्सा नहीं रहना चाहता। ट्रंप प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में अमेरिका WHO में दोबारा शामिल नहीं होगा।
78 साल पुराना रिश्ता टूटा
अमेरिका WHO का संस्थापक सदस्य था। 1948 में WHO की स्थापना के समय से ही अमेरिका इसका हिस्सा रहा और 78 वर्षों तक लगातार सदस्य बना रहा।
अमेरिका WHO का सबसे बड़ा फंड देने वाला देश था। हर साल अमेरिका करीब 111 मिलियन डॉलर सदस्य शुल्क के रूप में देता था। इसके अलावा 570 मिलियन डॉलर से ज्यादा का voluntary contribution भी दिया जाता था।

अब अमेरिका के बाहर निकलने से WHO को बड़ा वित्तीय झटका लगा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका पर WHO के 130 मिलियन से 278 मिलियन डॉलर तक बकाया हैं। कुछ आंकड़ों में यह राशि 260 मिलियन डॉलर बताई गई है। हालांकि ट्रंप प्रशासन ने साफ कर दिया है कि यह बकाया राशि भी नहीं चुकाई जाएगी।
वैश्विक स्वास्थ्य पर क्या होगा असर
WHO दुनिया भर में स्वास्थ्य आपात स्थितियों से निपटने में अहम भूमिका निभाता है। एमपॉक्स, इबोला, पोलियो और अन्य संक्रामक बीमारियों से लड़ने के लिए WHO देशों के बीच coordination करता है।
गरीब और विकासशील देशों को तकनीकी सहायता, वैक्सीन, दवाइयां और स्वास्थ्य गाइडलाइंस उपलब्ध कराना WHO की बड़ी जिम्मेदारी है। अमेरिका के बाहर निकलने से इन कार्यक्रमों पर सीधा असर पड़ सकता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से भविष्य की महामारियों से लड़ने की वैश्विक क्षमता कमजोर होगी। अमेरिका के वैज्ञानिकों और दवा कंपनियों को भी दूसरे देशों से जरूरी health data मिलने में दिक्कत आ सकती है, जो early warning system के लिए बेहद जरूरी होता है।
एक्सपर्ट्स की चेतावनी
जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के मशहूर हेल्थ लॉ एक्सपर्ट लॉरेंस गोस्टिन ने इस फैसले को ट्रंप का सबसे विनाशकारी राष्ट्रपति निर्णय बताया है। उनके मुताबिक यह कदम न सिर्फ अमेरिका, बल्कि पूरी दुनिया की सेहत को खतरे में डाल सकता है।
उनका कहना है कि बीमारियां सीमाएं नहीं देखतीं। अगर वैश्विक सहयोग कमजोर होता है, तो उसका असर सबसे पहले आम लोगों पर पड़ेगा।
सिर्फ WHO नहीं, एक साल में 70 संस्थाओं से दूरी
WHO से अलग होना कोई अकेला फैसला नहीं है। ट्रंप प्रशासन के दूसरे कार्यकाल के पहले साल में अमेरिका करीब 70 अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और समझौतों से बाहर निकल चुका है।
इनमें 31 संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी संस्थाएं शामिल हैं। इनमें आर्थिक और सामाजिक मामलों का विभाग, अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका और पश्चिम एशिया के लिए आर्थिक आयोग, अंतर्राष्ट्रीय कानून आयोग, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार केंद्र, पीसबिल्डिंग कमीशन और फंड, UN Women, UNFCCC, UN Population Fund, UN Water और UN University जैसी अहम संस्थाएं शामिल हैं।
गैर-यूएन संगठनों से भी अमेरिका ने तोड़ा नाता
इसके अलावा अमेरिका 35 गैर-यूएन संगठनों और समझौतों से भी बाहर निकल चुका है। इनमें Paris Climate Agreement, इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज IPCC, इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी, इंटरनेशनल सोलर अलायंस, इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर और ग्लोबल फोरम ऑन माइग्रेशन एंड डेवलपमेंट शामिल हैं।
कुछ संस्थाओं में बना रहेगा अमेरिका
हालांकि अमेरिका ने यह भी साफ किया है कि वह हर अंतरराष्ट्रीय मंच से बाहर नहीं जा रहा। अमेरिका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, World Food Programme WFP और UNHCR में बना रहेगा। सरकार का कहना है कि ये संस्थाएं राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवीय सहायता के लिहाज से अमेरिका के लिए जरूरी हैं।












