संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण 9 मार्च से शुरू हो रहा है। माना जा रहा है कि लोकसभा में स्पीकर Om Birla को हटाने के विपक्ष के प्रस्ताव पर चर्चा हो सकती है। विपक्ष ने उन पर आरोप लगाया है कि उन्होंने खुले तौर पर पक्षपातपूर्ण तरीके से काम किया है।
नई दिल्ली: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला (Om Birla) के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव लाया है। 118 सांसदों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। विपक्ष ने ओम बिरला पर पक्षपातपूर्ण व्यवहार का आरोप लगाया है, जबकि कांग्रेस ने कहा है कि यह प्रस्ताव संसदीय नियमों और परंपराओं के अनुसार है और इस पर संपूर्ण बहस होनी चाहिए।
विपक्ष का आरोप
विपक्ष ने दावा किया है कि स्पीकर ने विपक्ष के नेताओं, विशेषकर राहुल गांधी और अन्य सदस्यों को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलने की अनुमति नहीं दी। इसके अलावा, आठ विपक्षी सांसदों को निलंबित किया गया था। इन घटनाओं को लेकर विपक्ष का मानना है कि ओम बिरला ने स्पीकर के पद का दुरुपयोग किया।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा, "यह एक स्वस्थ और लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। हमने जो प्रस्ताव दिया है, वह नियमों और परंपराओं के मुताबिक है। इससे पहले भी ऐसा हो चुका है। उदाहरण के लिए, 1954 में महान स्पीकर जी वी मावलंकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। उन्होंने आगे कहा कि यह संसदीय लोकतंत्र का अधिकार है और विपक्ष को इस पर बहस करने का पूरा अधिकार है। जयराम रमेश ने स्पष्ट किया कि उन्होंने स्पीकर के पक्षपातपूर्ण व्यवहार के स्पष्ट उदाहरण दिए हैं और इस प्रस्ताव पर बहस होना चाहिए।
118 सांसदों ने दिया नोटिस

विपक्ष के 118 सांसदों ने मिलकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस लोकसभा सचिवालय को सौंपा। कांग्रेस की ओर से यह नोटिस सौंपने वाले सांसद हैं गौरव गोगोई, के सुरेश और मोहम्मद जावेद। संविधान के अनुच्छेद 96 के अनुसार, जब अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आता है, तो वह सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकते। लेकिन उन्हें सदन में अपना बचाव करने और बोलने का पूरा अधिकार होता है। इसके अलावा, स्पीकर प्रस्ताव पर वोट भी दे सकते हैं।
आगामी सोमवार, 9 मार्च को लोकसभा में इस प्रस्ताव पर चर्चा होने वाली है। इस दौरान ओम बिरला अध्यक्ष की कुर्सी पर नहीं बैठेंगे, बल्कि सदस्यों के बीच बैठकर अपनी बात रखेंगे।
इतिहास में पहले भी आए ऐसे प्रस्ताव
लोकसभा अध्यक्षों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव नई बात नहीं है। पहले तीन अध्यक्षों के खिलाफ ऐसा प्रस्ताव आ चुका है:
- जी वी मावलंकर (1954)
- हुकम सिंह (1966)
- बलराम जाखड़ (1987)
हालांकि, ये सभी प्रस्ताव सदन में गिर गए थे और कोई भी अध्यक्ष पद से हटाया नहीं गया।










