सुप्रीम कोर्ट ने लोकतंत्र को और अधिक सशक्त बनाने के लिए मतदान को अनिवार्य बनाने वाले तंत्र की आवश्यकता पर जोर दिया है। अदालत ने कहा कि ऐसा कोई गैर-दंडात्मक (नॉन-पनिटिव) तंत्र विकसित किया जा सकता है, जिससे अधिक से अधिक नागरिक मतदान में भाग लें।
Supreme Court on NOTA: भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को और मजबूत बनाने के संदर्भ में Supreme Court of India ने मतदान को अनिवार्य बनाने की दिशा में “मजबूत लेकिन गैर-दंडात्मक तंत्र” विकसित करने की आवश्यकता पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि यदि ऐसा तंत्र विकसित किया जाता है, तो अधिक नागरिक मतदान में भाग लेंगे, बेहतर उम्मीदवार सामने आएंगे और समय के साथ NOTA (None of the Above) का विकल्प अप्रासंगिक हो सकता है।
यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने कहा कि लोकतंत्र की सफलता व्यापक जनभागीदारी पर निर्भर करती है और मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए संस्थागत प्रयास जरूरी हैं।
NOTA पर अदालत की टिप्पणी
पीठ ने कहा कि NOTA का विकल्प मूल रूप से मतदाताओं को यह संदेश देने के लिए बनाया गया था कि यदि वे किसी भी उम्मीदवार को उपयुक्त नहीं मानते, तो वे असहमति दर्ज कर सकते हैं। इसका उद्देश्य राजनीतिक दलों को बेहतर और स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवार मैदान में उतारने के लिए प्रेरित करना था।
हालांकि, अदालत ने पिछले एक दशक के अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि बहुत कम प्रतिशत मतदाता ही NOTA का उपयोग करते हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि इस विकल्प की सीमाएं हैं और चुनावी सुधारों पर व्यापक बहस की आवश्यकता है।
मामला क्या है?

सुनवाई एक याचिका पर हो रही थी, जिसे विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी नामक संगठन ने दायर किया था। याचिका में मांग की गई थी कि जिन निर्वाचन क्षेत्रों में केवल एक उम्मीदवार मैदान में हो, वहां NOTA को भी एक वैकल्पिक “उम्मीदवार” के रूप में माना जाए। इससे यह स्पष्ट हो सके कि मतदाता उस अकेले उम्मीदवार को वास्तव में समर्थन देते हैं या नहीं।
इस पर अदालत ने कहा कि यदि NOTA को औपचारिक रूप से उम्मीदवार का दर्जा देना है, तो इसके लिए संसद को जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) में संशोधन करना होगा। न्यायपालिका सीधे तौर पर कानून में बदलाव नहीं कर सकती; यह विधायिका का अधिकार क्षेत्र है।
पक्ष और विपक्ष की दलीलें
वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने दलील दी कि यदि NOTA को एक औपचारिक विकल्प के रूप में सशक्त बनाया जाए, तो धनबल और बाहुबल के सहारे चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों पर दबाव बढ़ेगा। इससे वे विरोधियों को डराकर या हटा कर निर्विरोध चुनाव जीतने की रणनीति से बचेंगे। दूसरी ओर, भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कहा कि मतदान मौलिक अधिकार (Fundamental Right) नहीं है।
ऐसे में अनुच्छेद 32 के तहत दायर यह याचिका किस हद तक स्वीकार्य है, इस पर विचार किया जाना चाहिए। अनुच्छेद 32 नागरिकों को सीधे सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार देता है, लेकिन यह केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में लागू होता है। अटॉर्नी जनरल ने यह भी कहा कि न्यायपालिका को यह तय नहीं करना चाहिए कि जन प्रतिनिधित्व कानून में क्या बदलाव किए जाएं। यह संसद का विशेषाधिकार है कि वह कानून में संशोधन की आवश्यकता और प्रकृति तय करे।
सुनवाई के दौरान पीठ ने एक महत्वपूर्ण सामाजिक पहलू की ओर भी ध्यान दिलाया। अदालत ने कहा कि अक्सर शिक्षित और आर्थिक रूप से सक्षम वर्ग मतदान के दिन उदासीन रहता है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान एक उत्सव की तरह मनाया जाता है। यह अंतर लोकतांत्रिक भागीदारी की असमानता को दर्शाता है।












