Makar Sankranti 2026 पूरे भारत में 14 जनवरी, बुधवार को मनाया जाएगा। यह पर्व सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश और उत्तरायण की शुरुआत के उपलक्ष्य में आयोजित होता है। अलग-अलग राज्यों में इसे विभिन्न नाम, परंपरा और व्यंजनों के साथ मनाया जाता है, जैसे पोंगल, लोहड़ी, खिचड़ी और पतंगबाजी, जो भारतीय संस्कृति की विविधता को दर्शाते हैं।
Makar Sankranti: भारत में अलग-अलग परंपराओं और उत्सवों के साथ मनाया जाएगा: 14 जनवरी, 2026, बुधवार को पूरे देश में मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाएगा। यह पर्व तब आता है जब सूर्य देव धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उत्तरायण की शुरुआत होती है। उत्तर भारत में खिचड़ी, तिल-गुड़ और पतंगबाजी की परंपरा है, जबकि दक्षिण भारत में इसे पोंगल के रूप में मनाया जाता है। महाराष्ट्र, गुजरात और बंगाल में भी अलग-अलग रीति-रिवाजों और व्यंजनों के साथ उत्सव मनाया जाता है। यह पर्व सामाजिक, धार्मिक और कृषि दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश पर खुशियों और परंपराओं का त्योहार
मकर संक्रांति का पर्व भारत में हर साल बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। यह त्योहार तब आता है जब सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इसे उत्तरायण की शुरुआत भी कहा जाता है, जब सूर्य उत्तर दिशा की ओर गमन करता है। 14 जनवरी 2026, बुधवार को पूरे देश में मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाएगा। यह न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि कृषि, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी इसका विशेष महत्व है। भारत के अलग-अलग राज्यों में इसे अलग नामों, रीति-रिवाजों और व्यंजनों के साथ मनाया जाता है, जो देश की विविध संस्कृति का परिचय देते हैं।

उत्तर भारत खिचड़ी, तिल-गुड़ और पतंगों का त्योहार
उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति का दिन पवित्र नदियों में स्नान और दान के लिए खास माना जाता है। इस दिन खिचड़ी, तिल और गुड़ के लड्डू खाने की परंपरा है। बिहार और झारखंड में भी स्नान और दान का महत्व समान है, और दही-चूड़ा और तिलकुट खाने का चलन है।
पंजाब और हरियाणा में लोहड़ी मकर संक्रांति से एक दिन पहले (13 जनवरी) मनाई जाती है। इस दिन रात में अलाव जलाकर उसमें रेवड़ी, मूंगफली और पॉपकॉर्न डालकर पूजा की जाती है। पारंपरिक भोजन में सरसों का साग और मक्की की रोटी शामिल है।
दिल्ली और राजस्थान में भी तिल और गुड़ के व्यंजन बांटे जाते हैं, और राजस्थान में बड़े पैमाने पर पतंगबाजी का आयोजन होता है। गुजरात में इसे ‘उत्तरायण’ कहा जाता है और यह दो दिन तक चलता है। पहला दिन मुख्य उत्तरायण और दूसरा दिन वासी उत्तरायण के रूप में मनाया जाता है। यहां के पतंग महोत्सव विश्व प्रसिद्ध हैं।
महाराष्ट्र और गोवा में इसे संक्रांति कहा जाता है। विवाहित महिलाएं हल्दी-कुमकुम समारोह करती हैं और एक-दूसरे को तिल-गुड़ के लड्डू देती हैं, कहते हुए तिल-गुड़ खाओ, मीठा-मीठा बोलो।
दक्षिण भारत पोंगल के चार दिन
दक्षिण भारत में मकर संक्रांति को ‘पोंगल’ के नाम से मनाया जाता है। यह चार दिन तक चलता है और हर दिन की अपनी खास परंपरा है।
- भोगी पोंगल (पहला दिन): पुराने सामान को जलाकर नए की शुरुआत की जाती है।
- सूर्य पोंगल (दूसरा दिन): इस दिन चावल और गुड़ की खीर सूर्य देव को अर्पित की जाती है।
- मट्टू पोंगल (तीसरा दिन): इस दिन पशुओं की पूजा की जाती है।
- कानुम पोंगल (चौथा दिन): लोग रिश्तेदारों और मित्रों से मिलते हैं और बाहर घूमने जाते हैं।
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इसे संक्रांति या ‘पेद्दा पांडुगा’ कहा जाता है। लोग पारंपरिक मुग्गुलु (रंगोली) बनाते हैं और नए वस्त्र पहनते हैं। कर्नाटक में महिलाएं एक-दूसरे को एल्लु बेला (तिल, गुड़, मूंगफली और नारियल का मिश्रण) देती हैं। केरल में सबरीमाला मंदिर में ‘मकरविलक्कू’ की दिव्य ज्योति का दर्शन करना विशेष महत्व रखता है।
पश्चिम और पूर्व भारत गंगा, पीठा और सांस्कृतिक उत्सव
पश्चिम बंगाल और ओडिशा में मकर संक्रांति को ‘पौष संक्रांति’ कहा जाता है। बंगाल में गंगासागर में विशाल मेला लगता है, जहां श्रद्धालु डुबकी लगाते हैं। इस दिन पीठा और खीर जैसी पारंपरिक मिठाइयां बनाई जाती हैं।
इस तरह भारत में मकर संक्रांति सिर्फ एक धार्मिक त्योहार नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, कृषि और आपसी सौहार्द के प्रति आभार व्यक्त करने का एक तरीका भी है। विभिन्न राज्यों में भिन्न नामों, रीति-रिवाजों और व्यंजनों के बावजूद सूर्य पूजा, स्नान-दान और तिल-गुड़ का आदान-प्रदान हर जगह समान रहता है। यह त्योहार लोगों को मिलजुल कर खुशियों का उत्सव मनाने का संदेश देता है।
मकर संक्रांति का महत्व
मकर संक्रांति न केवल सूर्य देव को समर्पित है, बल्कि यह नए मौसम की शुरुआत और फसल कटाई का प्रतीक भी है। कृषि प्रधान देश भारत में यह पर्व किसानों और आम लोगों के जीवन में खुशहाली और समृद्धि लाने का माध्यम माना जाता है। पतंगबाजी, पोंगल, लोहड़ी और अन्य परंपराएं लोगों में सामाजिक मेलजोल और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करती हैं।
सभी राज्यों में अलग-अलग नाम और रीति-रिवाजों के बावजूद मकर संक्रांति का मूल संदेश एक समान है: प्रकृति के प्रति सम्मान, पारिवारिक मेलजोल और जीवन में मिठास और खुशहाली का उत्सव।











